कोहरे से लिपटी रात में से

भाप बन कर निकलूँ ना निकलूँ ,

आज आग जलाने के लिए

लकड़ी के गट्ठर ढो कर लाऊँगी ज़रूर।

 

इस घुटती तबाही को पीछे छोड़

रंगीन क्षितिज तक पहुँचूँ ना पहुँचूँ,

दहलीज़ पार करने के लिए

आज पाँव उठाऊँगी ज़रूर।

 

इन नीरस दीवारों को तोड़

नीरद को हथेली में उछालूँ ना उछालूँ,

उन्मुक्त गगन में उड़ान भरने के लिए

आज पंख फडफडाऊँगी ज़रूर।

 

(..to be continued)

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